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Friday, December 12, 2008
Sunday, January 6, 2008
KAVITAYAN
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"वो"
वो फ़िर आ गया.
पहले भी आया था.
साक्षी हैं कराहें,हिरोशिमा और नागासाकी की.
जो आज भी उबर नहीं पाया है,उसकी आमद से.
कई बार आया वो,
बार-बार आया.
फ़िर आया वो भेष बदल कर,
सबको नचाता रहा अपनी उंगलियों पर,
पूरे देश को,सम्पूर्ण विश्व को.
गया,मगर न जाने कितनी जानें ले कर.
वो दर्द अह्सास दिलाता है, कि वो आया था.
माना नहीं,
फ़िर आया.
और
हमारे टुकडे – टुकडे कर गया.
बना गया हमें
इन्सान से हिन्दू-मुसलमान,
सिख और क्रिस्तान.
ईश्वर,अल्लाह से अलग हो गया.
नहीं मिला उस पागल को टोबा टेक सिंह का पता.
अभी कुछ साल पहले
उसकी परछाईं पडी थी,मेरे आंगन में,
तीन चूल्हे जला गया.
अब
आंगन के हर चूल्हे पर पकने लगा है अकेलापन.
चूल्हों की आग ने रवैये बदल लिये हैं.
पहले यहीं आंगन के चूल्हे पर पकते थे प्यार,रिश्ते,भावनाऎं,
और,
ऐसा ही बहुत कुछ
पर अब,
अब पकता है,सिर्फ़ और सिर्फ़ अकेलापन.
फ़िर आया है इस बार,
कमरे की हवा बोझिल लगने लगी है,
घुटन का सिलसिला चल निकला है,
बिस्तर पर डर और तन्हाई साथ सोने लगे है,
फ़िर कुछ होगा
क्या होगा इस बार
आखिर
वो क्यों आता है बार–बार?
बार-बार?
हर बार .
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''मैं……?''
मैं जीवन हूं,
जीवन दाता भी मैं ही हूं.
मेरे ही समागम से संभव हो सकी है, स्रटी इस धरा पर.
मानव यदि मैं हूं ,तो पशु पछियों का अस्तित्व भी मुझसे ही है.
मेरे बगैर संभव नहीं है,संचालन स्रस्टि का.
एक विस्त्रत यात्रा के अनेकों पडाओं से गुज़रा हूं मैं.
किसी नवेली का सपना यदि मैं हूं,
तो मुझसे ही उपजती है बुड्ढी मां की आस.
निराकार होते हुए भी साकार हूं मैं.
मेरे होने से ही….
सम्भव हो सका है,
राम से रहीम तक का अस्तित्व.
बुद्ध हो या गांधी
इन्दिरा हो या सानिया,
सब मेरी ही देन है.
समाज के हर तबके की बुनियाद में मैं ही हूं.
अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीकों से प्रयोग होता रहा हूं मैं.
लज्जा का सुचक यदि मैं हूं
तो उचश्रंखल भी मैं हूं.
आनन्द की पराकाष्ठा का हेतु हूं मैं.
वात्सायन की रचना में समाहित यदि मैं हूं,
तो काम देव की शक्ति भी मैं ही हूं.
मुझसे ही रच गये हैं
काम कला के अद्दभुत अनूठे महाकाव्य, महाग्रंथ.
जीवन का पर्याय हूं मैं.
क्यों कि……………….
काम हूं…. मैं.
संजय शुभांकर
संपर्क :- +9833698589
+९१ 2228401571
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